प्रतिदिन की भांति ऑनलाइन सत्संग का आयोजन

प्रतिदिन की भांति ऑनलाइन सत्संग का आयोजन


ब्यूरो- प्रतिदिन की भांति ऑनलाइन सत्संग का आयोजन पाटेश्वर धाम के संत राम बालक दास जी द्वारा उनके ऑनलाइन ग्रुप सीता रसोई संचालन ग्रुप में प्रातः 10:00 से 11:00 बजे और दोपहर 1:00 से 2:00 बजे किया गया जिसमें भारतवर्ष में देशव्यापी सत्सग परिचर्चा प्रतिदिन आयोजित की जाती है एवं भक्तगण जुड़कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त करते हैं,विभिन्न विषयों पर आधारित यह सत्संग आज सभी की जिज्ञासाओं का केंद्र है, भक्तों को दिया जाने वाला यह मंच सभी को मुख्य रूप से अपने विचार को व्यक्त करने के लिए प्रेरित करता है, संत श्री द्वारा अपने भक्तों को ज्ञान के साथ-साथ धर्म, देश भक्ति भावना, राष्ट्रीयता के विचारों से ओतप्रोत कर देने वाला सत्संग आयोजन अद्वितीय है

     आज की सत्संग परिचर्चा में डूबोवती यादव जी ने तुलसीदास जी के सुंदरकांड के चौपाई "बिनु हरि कृपा मिलीही नही संता" पर प्रकाश डालने की विनती की इस विषय को स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि जिस प्रकार हरिद्वार जाने पर ही चारोधाम कर पाते हैं वैसे ही संतों के मिलने  पर ही हरि की कृपा प्राप्त की जा सकती है, राम जी की कृपा से ही हमें संतों का संग प्राप्त होता है और भक्ति भी संतों के बिना नहीं मिलती अतः यह दोनों ही एक दूसरे के पूरक है अतः यह दोनों जिसे मिल जाए उसके जीवन में आनंद का कोई अंत नहीं यदि हम कहे कि "बिन हरि कृपा मिलीही नही संता "तो रामचरितमानस में कहा गया है कि भगवान को कौन जानता है उन्हें जानने के लिए तो उन्हीं की कृपा हम पर होनी चाहिए,प्रभु को वही जान सकते हैं जिसे प्रभु जनवाना  चाहते हैं परंतु प्रभु किस रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत होंगे यह हमें ज्ञात नहीं होता वे तो साधु संत रूप में भी अपने आप को प्रस्तुत करते हैं अतः जब भी जीवन में संतों का आगमन हो तो उन्हें प्रभु का ही स्वरूप समझकर ग्रहण करना चाहिए

     परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए रामफल जी ने जिज्ञासा रखी की "चारी पदार्थ....... के भाव को स्पष्ट करने की विनती की इन पंक्तियों के भाव की स्पष्ट करते बाबा जी ने कहा कि माता-पिता बच्चों के लिए सबसे बड़ा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और कहा भी जाता है कि परिवार ही बच्चों के लिए प्रथम पाठशाला होती है अतः बड़े जैसा करते हैं वैसा ही देख बच्चे भी उसे ही सीखते अतः माता पिता एवं बड़ों को सदैव प्रेमपूर्ण  व्यवहार ही करना चाहिए ताकि उनके बच्चों पर इसका प्रभाव पड़ जाए और वह भी उसी तरह का व्यवहार प्रस्तुत करें l