लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी तुम्हारा स्थान मेरे सिर पर होगा विष्णु- हुमेन्द्रगिरी गोस्वामी

लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी तुम्हारा स्थान मेरे सिर पर होगा विष्णु- हुमेन्द्रगिरी गोस्वामी

लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी तुम्हारा स्थान मेरे सिर पर होगा विष्णु- हुमेन्द्रगिरी गोस्वामी


छुरा-ग्राम पंचायत हरदी में श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिन पं.हुमेन्द्रगिरी गोस्वामी रांकाडीह वाले मधुबन धाम ने जलांधर चरित्र, तुलसी वर्षा,के साथ शोभायात्रा निकाला गया प्रवचनकर्ता ने जलांधर चरित्र और तुलसी वर्षा की कथा भागवत प्रेमी श्रद्धालु भक्तों को सुनाया जालंधर नाम का एक पराक्रम असुर था जिसका विवाह वृंदा नाम की कन्या से हुआ वृंदा भगवान विष्णु के परम भक्त थी और पतिव्रता थी। इसी कारण जालंधर अजय हो गया अपने अजय होने पर जालंधर को अभिमान हो गया और वहां स्वर्ग की कन्याओं को परेशान करने लगा दुखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और जालंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे भगवान विष्णु अपनी माया से जालंधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया इससे जालंधर की शक्ति क्षीण हो गयी और वहां युद्ध में मारा गया जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल  का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का श्राप दे दिया देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने अपना श्राप वापस ले लिया लेकिन भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे।





अतः वृंदा के श्राप को जीवित रखने के लिए उन्होंने अपना एक रूप पत्थर रूप में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया भगवान विष्णु को दिया श्राप वापस लेने के बाद वृंदा जालंधर के साथ सती हो गई वृंदा के राख से तुलसी का पौधा निकला वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया इसी घटना को याद रखने के लिए प्रतिवर्ष कार्तिक शुल्क एकादशी यानी देव प्रबोधिनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है। शालिग्राम पत्थर गंडकी नदी से प्राप्त होता है भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी तुम्हारा स्थान मेरे सिर पर होगा मैं तुम्हारे बिना भोजन ग्रहण नहीं करूंगा यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते।श्रीमद्देवी भागवत पुराण में जलंधर की जो कथा मिलती हैं उसके अनुसार एक बार भगवान शिव ने अपना तेज समुद्र में फेंक दिया जालंधर उत्पन्न हुआ इसलिए इसे शिव पुत्र भी कहा जाता था जलंधर की शक्ति थी उसकी पत्नी वृंदा जिसके पतिव्रत धर्म के कारण सभी देवी-देवता जलंधर मिलकर भी उसे पराजित नही कर पा रहे थे।