10 वीं के बाद विषयों का चयन करने में बरती जाने वाली सावधानियां व मार्गदर्शन डॉ संजय गुप्ता, प्राचार्य आई.पी.एस.

10 वीं के बाद विषयों का चयन करने में बरती जाने वाली सावधानियां व मार्गदर्शन डॉ संजय गुप्ता, प्राचार्य आई.पी.एस.

०० 10 वीं के पश्चात विषयों के चयन को लेकर डॉ.संजय गुप्ता ने सांझा किये अपने विचार

 

०० 10वीं उपरांत बच्चों के टैलेंट, स्किल, दिलचस्पी के आधार पर विषयों का चयन करना बच्चों के भविष्य हेतु लाभप्रद : डॉ संजय गुप्ता (प्राचार्य आई.पी.एस.)

 

०० ज्ञान अर्जित करने के साथ निरंतर अपने स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करने से हर परिस्थिति में अपने स्किल के अनुसार अपने आप को मोड़ सकते हैं : डॉ संजय गुप्ता

 

जल्द ही 10 सीबीएसई के परीक्षा परिणाम घोषित होने हैं छात्र छात्राओं व उनके परिजन अगली कक्षा में विषयों के चयन को लेकर असमंजस मे रहते हैं तो उनको मार्गदर्शन प्रदान करने हेतु हमनें इस विषय पर जब इंडस पब्लिक स्कूल दीपका के प्राचार्य डॉक्टर संजय गुप्ता से वृस्तृत चर्चा कर समाधान निकालने की कोसिस की तब परिचर्चा के दौरान उन्होंने बतलाया कि चंद दिनों में सीबीएसई 10th के परीक्षा परिणाम घोषित होने हैं जिसके उपरांत पास हुवे बच्चों के साथ-साथ उनके परिजन भी अगली कक्षा में किस विषय का चयन करें जिसको लेकर चिंतित रहते हैं व मार्गदर्शन की कमी की वजह से कई मर्तबा दूसरों की देखा देखी अपने बच्चों को भी उसी विषयों का चयन करने की राय देते हैं कई मर्तबा राय से बढ़कर उसी विषय मे उसका एडमिशन करवा भी देते हैं व बच्चे के मन की बात उसका टैलेंट उसके स्किल उसकी दिलचस्पी उसके झुकाव किस फील्ड किस विषय की तरफ है उसको नजरअंदाज कर देते हैं जिससे दिलचस्पी अनुसार विषय का चयन ना कर पाने में एक तो बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लगता दूसरा बोरियत सी महसूस होती है ऐसा पूर्व के पासआउट छात्रों का अनुभव रहा है

 

चंद दिनों में 10 वी सीबीएसई के नतीजे घोषित हो जाएंगे परीक्षा परिणाम के साथ बच्चों के साथ परिजन भी आगे की विषय चयन करने से सम्बंधित जद्दोजहत शुरू हो जाएगी पर एक बात का ख्याल रखना अत्यंत आवश्यक है कि विषय का चयन बच्चों की दिलचस्पी गुण, इनर क्वालिटी टैलेंट को देखकर करें फोर्सफुली बच्चों को जबरन परिजन द्वारा तय विषयों को चयन करने हेतु बाध्य करने पर बच्चे इसके पश्चात अपना सत प्रतिशत नहीं दे पाते, चूंकि थोपी गई, व चाही गई चीजों में फर्क होता है कोई किसी विषय को आंतरिक तौर पर इसलिय महत्व देता है चूंकि उसके अंदर उससे संबंधित आंतरिक गुण निहित होते हैं जिसकी वजह से उक्त विषय की पूर्ण जानकारी ज्ञान हांसिल करने के लिये मन उत्सुक होता है, तो मन सम्बन्धित विषय का चयन करने हेतु प्रेरित करता रहता है, वहीं माता पिता भले ही बच्चों के भले के लिये अपने नजरिये व परिस्थिति के अनुसार विषयों का चयन करने हेतु बाध्य करते हैं, कई घरों में परिजन तो बच्चों के जन्म लेते ही उनका करियर अपने मन मे तय कर लिये होते हैं कि हमारी संतान अमुख पद पाने की पढ़ाई पढ़ेगा पर यह उनके पॉइंट ऑफ व्यू से सही हो सकता है पर आगे चलकर समय के साथ समाज देश की परिस्थिति भी बदलती रहती है व दौर के साथ लोग अपने गुण को मिलाते हुवे सम्बन्धित फील्ड में अपना कैरियर बनाने हेतु विषयों का चयन किया करते हैं, अब यहां कई मर्तबा माता पिता द्वारा अन्य बच्चों के द्वारा चुने गए फील्ड का हवाला देते हुवे बच्चों को भी उसी फील्ड में जाने को प्रोत्साहित करते हैं, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राय देना अच्छी बात है देनी भी चाहिए पर कोई हमारी ही राय अनुसार चले यह अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए व राय ना मानने पर बुरा नहीं लगना चाहिए क्योंकि सबका अपना अलग नजरिये होता है, और नजरिया अनुभव से ही मन में बनता है जिसका जैसा अनुभव उसका वैसा नजरिया होता है जब इस विषय पर हमने कुछ विद्यालय परिसर से पास हुवे बच्चों से संपर्क साधकर उनके विचार जानने चाहे तो कई बच्चों द्वारा बतलाया कि वह संतुष्ठ हैं क्योकि उन्होंने अपने चॉइस के अनुसार विषयों का चयन किया था व आगे सफल व असफल होने पर उसके जिम्मेदार भी स्वयं ही होंगे पर इस बात का मलाल नहीं रहेगा कि जिस फील्ड में दिल था आंतरिक हुनर था वह ना चुनकर अन्य द्वारा सुझाया गया विषय चयनित कर थोपी गई जीवन जी रहे हैं, तथा अगर फेलियर हो भी जाते हैं तो वह एक अनुभव रहेगा जिन कमियों को हटाकर पुनः प्रयत्न कर सफलता हांसिल की जा सकती है चूंकि मार्ग स्वयं के द्वारा चयनित किया गया होता है तो सत प्रतिशत जिम्मेदारी भी स्वयं की होती है कि अपने स्किल्स को अपने अनुभव को अपने ज्ञान को सहीं जगह लगाकर एनर्जी का सदुपयोग करें, पर अगर बात करें थोपी विषय को ताउम्र ईमानदारी से ढोने की तो इस संबंध में अनुभवी बच्चों का मानना है कि जो जिम्मेदारी हम खुद अपनी दिलचस्पी से उठाते उसे निभाने में अपना सत प्रतिशत देते हैं वहीं जिन जिम्मेदारियों को हम पर थोपा जाता है उसे मजबूरी में एक हद तक तो निभाते रहते हैं पर जब मन जवाब दे देता है तो निभाना भी छूट जाता है चूंकि वह अपनी दिलचस्पी का फील्ड या विषय नहीं होता तो दिल लगाकर पढ़ाई भी नहीं होती व बाद में उस फील्ड में दिल लगाकर काम भी नहीं होता जिससे थकान महसूस होती है बोरियत महसूस होती है| अक्सर पाया गया कि 11 वीं व बारहवीं या आगे की पढ़ाई पर ही बच्चों का भविष्य निर्धारित करता है चूंकि 11 वीं में पहला मोड़ आता है जो उसको कैरियर से सम्बंधित विषय क्रमसः साइंस, आर्ट, कॉमर्स में से किसी एक का आरंभिक पढ़ाई चयन करना होता है तदुपरांत आगे 12 वी के पश्चात जब कॉलेज या यूनिवर्सिटी में जाते हैं तो 11 वीं बारहवीं में चयनित विषयों पर विस्तार से पढ़ाई की जाती है, इसलिय विषय चयन में हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए सोच समझकर कदम उठाना चाहिए अपने टैलेंट स्किल व दिलचस्पी के विषय फील्ड का चयन करना चाहिए राय सबकी लेनी चाहिए पर जो आपके लिए सबसे बेस्ट लगे जिस रास्ते पर आप पूरे आत्मविश्वास से आगे बढ़ सकते हों उसका चयन करना चाहिए, जिस विषय मे आपकी दिलस्चपी हो उस विषय को चयनित करना चाहिए अक्सर देखा जाता है जब कई मर्तबा मार्गदर्शन की कमी की वजह से असमंजस में प्रायः छात्र छात्राओं के विषय चयन का आधार यह भी होता है कि उनके मित्र किस विषय का चयन कर रहे हैं व समझ मे ना आने से वह भी उसी विषय का चयन कर लेते हैं ऐसा बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए जीवन में मित्र भले ही आवश्यक है पर विषयों के चयन का आधार यह नहीं होना चाहिए कि मित्र ने कौन सा विषय चयनित किया हम भी उसे ही चयनित करें, चूंकि मित्र तो अपने टैलेंट, स्किल के अनुसार सम्बन्धित विषय का चयन किया हुआ होता है पर हम अपने अंदर के स्किल टैलेंट को ना समझ पाने की वजह से अपने पोटेंशलिटी को ना समझ पाने की वजह से अलग मार्ग का चयन कर लेते हैं फिर आगे चलकर उस फील्ड में अपना सत प्रतिशत योगदान नहीं दे पाते चूंकि हमारे अंदर की स्किल व टैलेंट अलग होते हैं व दूसरों की देखा देखी हम किसी अन्य विषय पर ज्ञान अर्जित कर अपने आप को निखारने की कोसिस में लगे रहते हैं प्रायः लोग ज्ञान व स्किल के बीच कंफ्यूज हो जाते हैं उनके लिये यह जानना आवश्यक है कि उदाहरण के तौर पर आप तैरना चाहते हैं जिससे सम्बन्धित ज्ञान आप यू ट्यूब पर वीडियो देखकर हांसिल कर सकते हैं पर तैर नहीं सकते जबतक आप उसे प्रैक्टिकल में बार बार प्रैक्टिस नहीं करते तब तक वह स्किल डेवेलोप नहीं होती हम जिन कार्यों को बारंबार करते हैं वह हमारे सब कॉन्शियस माइंड में रिकॉर्ड हो जाता है फिर हमारे कर्म व्यवहार में वह स्किल आ जाती है जैसे जब हम तैरना सिख जाते हैं तब जबकभी हमें जरूरत होती है हमें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती चूंकि वह हुनर हमारे अंदर डेवेलोप हो चुकी होती है व स्किल हमारे सब कॉन्शियस माइंड में रिकॉर्ड होकर ऑटोमैटिक मोड़ में चला जाता है जब जहां उस स्किल की जरूरत होती है वह आपेही बाहर आकर उस स्किल के अनुसार बाहर कार्य हो जाता है तो नॉलेज लेना व स्किल में बड़ा फर्क होता है इस बात को लोगों को समझना पड़ेगा ज्ञान हांसिल करना अलग है ज्ञान को प्रैक्टिस कर अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाना अलग है तो हमें निरंतर सीखते रहने की आदत डालनी चाहिए जिस फील्ड में भी जाएं उस फील्ड को गहराई से सीखने की आदत डालनी चाहिए व नित नए स्किल डेवेलोप करते रहने चाहिए चूंकि स्किल हमें स्वयं अपने आप को प्रेरित करता है स्किल हमें ड्राइव करता है अगर समय व परिस्थिति के अनुसार हम अपने स्किल डेवेलोप नहीं करते तो हम अपने साथ साथ परिवार वालों के लिये भी बोझ बनते जाते हैं, चाहे जिस फील्ड का जिस विषय का चयन करें सफलता का मूल मंत्र ज्ञान के साथ साथ गुणों को स्किल को डेवेलोप करने से हम सफलता के करीब पहुंचते जाते हैं| जिन किन्ही विद्यार्थियों को विषय चयन से सम्बंधित मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी तो कॉल करके या व्यक्तिगत तौर पर प्रत्यक्ष रूप से मुलाकात करके मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं आप हमारा पता व फ़ोन नंबर गूगल पर सर्च करके जानकारी प्राप्त कर सकते हैं| इंडस पब्लिक स्कूल, दीपका-बतारी, कोरबा