गुरु पूर्णिमा पर्व आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुजनों को समर्पित

गुरु पूर्णिमा पर्व आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुजनों को समर्पित

गुरु पूर्णिमा पर्व आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुजनों को समर्पित



छुरा-आषाढ़ माह मेंं पड़ने वाली पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। गरियाबंद जिले के  जनपद पंचायत छुरा अन्तर्गत ग्राम पंचायत मड़ेली के स्कूल प्रांगण में ग्राम के जनप्रतिनिधि एवं ग्राम प्रमुखों के द्वारा गुरूजनों को पुष्प, श्रीफल और गमछा आदि भेंट कर सम्मानित कर गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया गया।

      गुरु पूर्णिमा का पर्व हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। ये दिन गुरुओं को समर्पित है। इसी दिन तमाम ग्रंथों की रचना करने वाले महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। मानव जाति के प्रति उनके योगदान को देखते हुए उनके जन्मोत्सव को गुरू पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने ही पहली बार मानव जाति को चारों वेदों का ज्ञान दिया था। इसलिए इन्हें प्रथम गुरु की उपाधि दी जाती है। तभी से उनके सम्मान में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।  हिंदू धर्म में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है।




    गुरु पूर्णिमा का महत्‍व: महर्षि वेद व्यास संस्कृत के महान विद्वान थे। महाभारत जैसा महाकाव्य उनके द्वारा ही लिखा गया था। इसके अलावा 18 पुराणों के रचयिता भी महर्षि वेदव्यास ही माने जाते हैं। साथ ही वेदों को विभाजित करने का श्रेय भी इन्हीं को दिया जाता है। यूं तो हर पूर्णिमा का महत्व अधिक होता है, लेकिन गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरुओं की पूजा करने का विशेष महत्व है। पुराने समय में गुरुकुल में रहने वाले शिष्य गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरुओं की विशेष पूजा-अर्चना किया करते थे। इस दिन केवल गुरु ही नहीं अपितु परिवार में वरिष्ठ जनों, बड़ों जैसे माता-पिता, भाई-बहन आदि का आशीर्वाद लिया जाता है।

   गुरु शब्द दो शब्दों के मेल से बना है,- प्रथम गु जिसका अर्थ है अंधकार तथा दूसरा रू का अर्थ है दूर करने वाला, इसका वास्तविक अर्थ, "वह जो व्यक्ति के अज्ञान रुपी अंधकार को ज्ञान के प्रकाश द्वारा दूर करता है।




 ‌ एकलव्य छिपकर गुरु द्रोणाचार्य से धनुष विद्या सीखा करते थे। एकलव्य एक बेहतरीन धनुर्धर थे।मगर द्रोणाचार्य पहले से ही अर्जुन को संसार का सबसे अच्छा धनुर्धर बनाने की कसम खा चुके थे।वह जानते थे कि एकलव्य, अर्जुन से धनुष चलाने में बेहतर है। इसलिए उन्होंने एकलव्य को बुलाया और गुरु दक्षिणा के रूप में उसका अंगूठा मांगा।

  एकलव्य ने अंगुठा काटकर अपने गुरु जी को गुरु दक्षिणा के रूप दिया। इससे यह साबित हुआ कि एकलव्य ना केवल बेहतरीन धनुर्धर थे,बल्कि एक अच्छे शिष्य भी थे। एकलव्य के लिए गुरु से बढ़कर शिक्षा नहीं थी। उसने यह शिक्षा अपने गुरु के लिए सीखी थी। उसने गुरु के महत्व को समझते हुए एकलव्य ने गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा गुरु को दे दिया। कई पौराणिक शास्त्रों व वेदों में गुरु को देवता से अधिक ऊपर बताया गया है क्योंकि गुरु से ही व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति होती है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल परंपरा का चलन था,,तब सभी छात्र गुरू पूर्णिमा के दिन अपने गुरु की पूजा-अर्चना करके उनका आशीर्वाद लेकर धन्यवाद करते थे।

उन सभी आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुजनों को समर्पित परंपरा है जिन्होंने कर्म योग आधारित व्यक्तित्व विकास और प्रबुद्ध करने, बहुत कम अथवा बिना किसी मौद्रिक के अपनी बुद्धिमत्ता को साझा करने के लिए तैयार हो। 

इस कार्यक्रम के दौरान- श्रीमती लक्ष्मी गजेन्द्र ठाकुर,(सरपंच), भीखम सिंह ठाकुर (उपसरपंच), भंगीराम नेताम (शाला प्रबंधन समिति अध्यक्ष व ग्रामीण सचिव), तेजराम निर्मलकर (ग्रामीण सहसचिव),अमृत ठाकुर(ग्राम प्रमुख),लखन ग्रामीण कोटवार, जीवन टाण्टे, एच.आर.साहू(प्रधान पाठक पू.मा.शा.मड़ेली)व के.एस.यदु(प्रधान पाठक प्रा.शा. मड़ेली), चमन साहू,(शिक्षक), अरुण कुमार साहू(शिक्षक),टायल राम पटेल (शिक्षक),रूपनाथ ठाकुर (शिक्षक), योगिता मिश्रा (शिक्षिका), ममता ध्रुव(शिक्षिका), नर्मदा ध्रुव (शिक्षिका), रेणु कुर्रे (शिक्षिका), लता जलक्षत्री (शिक्षिका) आदि उपस्थित रहे।