ऑनलाइन सत्संग का आयोजन

ऑनलाइन सत्संग का आयोजन


ब्यूरो-प्रतिदिन की भांति ऑनलाइन सत्संग का आयोजन संत राम बालक दास जी के द्वारा  आज भी  उनके द्वारा सीता रसोई के चारों वाट्सएप ग्रुपों में  सुबह 10:00 बजे से किया गया जिसमें सभी भक्तगण अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किए

   आज की सत्संग परिचर्चा में बाबा जी ने सभी को उपदेश दिया कि यह सोचना कि राम ने जो रचा है वही होगा हमारे कहने या करने या सोचने से कुछ नहीं बदलेगा तो यह बिल्कुल ही गलत है क्योंकि भगवान को जो रचना था वह वह रचना कर चुका है अर्थात आप उनकी रचना है और अब हमें हमारी रचना स्वयं करनी है हमारे कर्म ही हमारा प्रारब्ध  बनाएगा हमारा पुरुषार्थ  हमारी प्राप्ति बनवाएगा भगवान ने तय तो कर  दिया है परंतु उसे पाने हेतु आपको पुरुषार्थ तो करना ही पड़ेगा पुरुषार्थी व्यक्ति को ही प्रकृति द्वारा बना बनाया प्राप्त होता है 

             आज की सत्संग परिचर्चा में पाठक परदेसी जी के द्वारा  जिज्ञासा रखी गई की  सुनहु राम कर सहज सुभाऊ निज अपराध रीसाही ना काऊ जो अपराध भगत कर करई राम रोष पावक शो जरईll

प्रकाश डालने की कृपा हो, इन पंक्तियों के भाव को स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी स्पष्ट रूप से राम जी के चरित्र को इंगित किया है वे कहते हैं कि राम कौन है राम वह है  जिनका हृदय उदार है उनका स्वभाव बहुत ही निर्मल है जिनको किसी चीज का विषाद नहीं है जिनको सुख में सुख का घमंड नहीं और दुख में तनिक भी अवसाद नहीं है सहज स्वभाव है कोई अपराध करें उस पर भी ध्यान नहीं देते कोई गलती भी करे तो वह उसे अनदेखा कर देते हैं ना तो स्वामी भाव है ना ही सेवक का कोई भाव है परंतु एक अपराध वे कभी भी क्षमा  नहीं करते यदि कोई उनके भक्तों के साथ अपराध करता है या दुर्व्यवहार करता है तो वह उस अपराधी को कभी भी क्षमा नहीं करते इसीलिए भक्त या भक्ति में मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के साथ कभी भी किसी भी तरह का कोई अपराध नहीं करना चाहिए क्योंकि भक्त तो आप को अनदेखा कर देगा चुप रह जाएगा परंतु भगवान कभी भी आपको नहीं छमा करेंगे आप उनके कोप का भाजन अवश्य बनेंगे

             सत्संग  परिचर्चा में रामफ़ल जी ने रामचरितमानस की पंक्ति बिनु सत्संग विवेक न होई के.... भाव को स्पष्ट करने की विनती बाबा जी से कि बाबा जी ने उनके भाव को बताते हुए कहा कि वस्तुतः निश्चित ही भक्ति से परमात्मा प्रसन्न होते हैं परंतु भगवान का प्रसन्न होना उनसे मिलन नहीं होता वह हमें उसका रास्ता बता देते हैं हमें संतों से मिला देते हैं इसीलिए तो कहा भी गया है कि "प्रेम जब अनंत हो गया रोम रोम संत हो गया " सत्संग की प्राप्ति ही यही है कि आप संत के शरणागत हो जाओ और जब संत के शरण हुए उन से शिक्षा ली दीक्षा प्राप्त कर ली तो मन भी सत्संग में ही होना चाहिए ऐसा अगर भाव जब आपके मन में आ जाएगा तब तो साक्षात आपको परमात्मा के दर्शन प्राप्त होंगे

        रामेश्वर वर्मा जी ने निम्न पंक्तियों के भाव को स्पष्ट करने की विनती बाबा जी से की 

बिनु बिस्वास भगति नहीं तेहि बिनु द्रवहि न रामु। राम कृपा बिनु सपनेहुं जीव न लह विश्रामु।।  इनके भाव को स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि रामचरितमानस एक ऐसा ग्रंथ है जिसका प्रत्येक दोहा चौपाई सौरठा हमारे जीवन में अनेकानेक परिवर्तन ला सकता है यहां तुलसीदास जी का भाव है कि आप में पहले विश्वास होना आवश्यक है हम भक्ति करते हैं मंत्र जाप करते हैं भजन करते हैं तो उसमें पूर्ण विश्वास होना चाहिए आप जिस भी प्रभु या इष्ट की भक्ति करते हैं तो वह पूर्ण विश्वास से करिए तभी आपको वह प्राप्त होगा विश्वास से भक्ति प्राप्ति होगी भक्ति से भगवान की प्राप्ति  और भगवान से विश्राम की प्राप्ति होगी

      राजकुमार यादव जी ने जिज्ञासा रखी की होइहि सोई जो राम रचि राखा।

को करि तर्क बढ़ावे साखा।। इन पंक्तियों के भाव को स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि यदि हम सोच ले कि जब जो हो रहा है वह अच्छा ही हो रहा है और आगे जो होगा वह भी अच्छा ही होगा ऐसा भाव मानकर हम अपने कर्म ना करें तो यह बिल्कुल ही गलत है प्रभु के द्वारा सभी कुछ निश्चित किया गया है समय पर ही बारिश होगी समय पर ही ठंड पड़ेगी समय पर ही गर्मी पड़ेगी पेड़ पहाड़ नदी तालाब जो भी है वह निश्चित है परंतु आप यह सोचेंगे कि हम पेड़ को काट देते हैं नदियों को मोड़ देते हैं और प्रदूषण फेला देते हैं और यह भी राम के द्वारा रचित है तो यह बिल्कुल ही  वितर्क है प्रकृति द्वारा रचित प्रत्येक कृत राम रचित  है परंतु आप अपनी उद्दंडता से मान लेंगे कि हम जो कर रहे हैं वह भी राम रचित है तो यह बिल्कुल ही गलत है

 इस प्रकार आज का ज्ञान पूर्ण सत्संग संपन्न हुआ

 जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम