भागवत गीता जो हमें हर बार गिरने से बचाती है,हमारे असहाय जीवन को सहारा देती है -बालक दास

भागवत गीता जो हमें हर बार गिरने से बचाती है,हमारे असहाय जीवन को सहारा देती है -बालक दास


ब्यूरो-भागवत गीता जो हमें हर बार गिरने से बचाती है,हमारे असहाय जीवन को सहारा देती है भगवत गीता हमें नित्य नए उत्साह देती हैं,ऐसी भगवत गीता जिसमें श्री कृष्ण की वाणी उद्धृत है का ज्ञान श्री पाटेश्वर धाम के संत बालक दास जी द्वारा प्रतिदिन अपने भक्तों को प्रसाद रूप में दिया जा रहा है इसमें ऑनलाइन सत्संग के द्वारा इसका अद्भुत प्रेषण  किया जा रहा है, भारतवर्ष के लिए गौरव की बात है कि जो गीता  हमें पशुता से मुक्त कराती है उसका ज्ञान हम प्रतिदिन प्राप्त कर पा रहे है

          गीता ज्ञान में बाबा जी ने अपनी भिवानी में सभी को भगवान श्री कृष्ण की वाणी से अवगत कराते हुए बताया कि हमें भगवान के वचन को जानना आवश्यक है ंकि भगवान के रास्ते में चलने वाला भगवत भजन करने वाले का कोई भी भाव भजन कभी नष्ट नहीं होता वह धरती में पड़े बीज के समान सुरक्षित रहता है और समय देखकर वहां प्रकट होता रहता है गीता अध्याय 2 श्लोक 40 में,जैसे कि यहां पर श्री कृष्ण जी कह रहे हैं, मनुष्य जब आत्म क्रिया, आंतरिक आनंद को ले लेता उसे प्राप्त कर पाता है अर्थात आत्मदर्शन से स्वयं को देख पाता है स्वयं को झांक पाता है बहिर  मुखी ना होकर अंतर्मुखी हो जाता है तो वहां बाहर के आनंद से अधिक अंदर की अनुभूति को प्राप्त कर लेता है हम बाहर जिस आनंद को ढूंढते हैं वह व्यर्थ है इसको प्राप्त करने के लिए यदि हम थोड़ा भी अभ्यास करेंगे तो जीवन मरण के भय से स्वयं श्री कृष्ण भगवान तुम्हें मुक्त करा देते हैं अर्थात भगवत स्वरूप मैं मन लगाएं परमात्मा का सुमिरन करे तो इंसान जन्म मरण से मुक्त हो जाता है,

          कभी-कभी जब हम कोई पुणे प्रताप कार्य करते हैं व्रत उपवास में अपने कोलीन कर लेते हैं और वह हमसे टूट जाता है तो हम मान लेते हैं कि वह तो हमसे छूट गया परंतु ऐसा नहीं है भगवान कहते हैं कि सद मार्ग में चलने वाले व्यक्ति का पुण्य कर्म कभी नाश नहीं होता उन्हें कर्म यदि छूट भी गए हो उस अंग में आकर हम भटक भी गए हो तो भी सत्संग के सानिध्य से वह पुनः प्रकट हो जाता है इसीलिए आलस्य को त्यागकर भजन टूट भी जाए तो उसे पुनः प्रारंभ करें, श्री कृष्ण की वाणी महान भगवत गीता के ज्ञान से जो व्यक्ति वंचित है वह पशु समान जीवन जीता है,  गीता महत्व में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहते हैं कि जब मैं तेरी भक्ति पर विश्वास करता हूं तो तू मेरी शक्ति पर विश्वास क्यों नहीं करता सदा मन में विश्वास रखें कि परमात्मा हमारे साथ हैं यह गीता का महत्व है

          प्रतिदिन ही रिचा बहन के द्वारा अद्भुत मीठा मोती का प्रेषण ऑनलाइन सत्संग परिचर्चा में किया जाता है जो सभी के ज्ञान का केंद्र है आज के मीठा मोती मे संदेश दिया की "अगर कोई आप की गलती बताए तो अपमानित महसूस न करे उसमें से उपयोगी बातों को लेकर अपनी कमियों को अवश्य सुधारे।",  के भाव विस्तार पर बाबा जी ने बताया कि अगर आपकी गलती कोई बताता है तो आप सोचते हैं कि आपका अपमान हुआ आपके माता पिता गुरु आपकी गलती बताए तो उसे सुधारना चाहिए ना कि उसे नाराज होना चाहिए लेकिन संत तो यहां तक कहते हैं कि "निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय,बिन पानी बिन साबुन के निर्मल करे सुभय " जो निंदक होता है वहां हर घड़ी आपकी निंदा करते रहता है आप अच्छा कर्म भी करेंगे तो भी वह आपकी निंदा करेगा उसका भी बुरा नहीं मानना चाहिए अपमान महसूस नहीं करना चाहिए मैं गलत नहीं कर रहा हूं तो भी यहां मेरी नींद आ कर रहा है जब गलत करूंगा तो वहां कितनी निंदा करेगा तो उन बुरे कर्मों से बचने के लिए निंदक भी हमारा सहायक है

         रामफल जी ने भरत को जड़ भरत क्यों कहा कहा गया इस विषय को स्पष्ट करने की विनती बाबाजी से की, इस विषय को बताते हुए बाबा जी ने कहा कि भरत तीन रूप में अवतरित हुए, महान भक्त,भक्त भरत  श्री राम के अनुज भाई भरत, जिन्होंने अपनी भ्राता  धर्म का और धर्म रक्षा का अद्भुत उदाहरण पूरे भारतवर्ष में प्रस्तुत किया, एक बे  भरत जड़ भरत जिनकी मृग पर आसक्ति होने के कारण उन्हें मरणो उपरांत मृग  का रूप धारण करना पड़ा, एक हुए शकुंतला पुत्र भरत जो महाकवि कालिदास के महानायक है जो शेर से खेल कर बड़े हुए जिनके कारण भारत का नाम भारत पड़ा

     प्रतिदिन की भांति पाठक परदेसी जी के अद्भुत ज्ञान से भरे हुए प्रश्न भी आज प्रस्तुत हुए आज के प्रश्न में पाठक परदेसी जी ने बाबा जी के समक्ष गीता पर जिज्ञासा प्रस्तुत की,गीता में भगवान ने कहा है कि मुझ में ही मन रख भगवान में ही मन रखने वाले भक्तों पर भगवान की क्या-क्या कृपा होती है,  यहां पर बाबा जी कहते हैं कि भगवान कहते हैं कि जो मेरे मन में रहने वाला है मेरे आश्रित हो मेरा भजन करने वाला है मुझ में ही आश्रित होकर केवल मेरे परायण हो जाए यदि वह ऐसा करेगा तो मैं शुभ अशुभ ना देखते हुए उसे स्वीकार करूंगा क्योंकि जो मेरा आश्रित हो जाएगा वह कभी बुरे कर्म कर ही नहीं सकता ऐसा दृढ़ता से श्री कृष्ण जी ने भगवत गीता में कहा है

 आज का  ज्ञान से भरा हुआ सत्संग संपन्न हुआ

 जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम