प्रवचनकर्ता हुमेन्द्रगिरी गोस्वामी पावन धरा धाम हरदी में बह रहे ज्ञान यज्ञ की गंगा

प्रवचनकर्ता हुमेन्द्रगिरी गोस्वामी पावन धरा धाम हरदी में बह रहे ज्ञान यज्ञ की गंगा

प्रवचनकर्ता हुमेन्द्रगिरी गोस्वामी पावन धरा धाम हरदी में बह रहे ज्ञान यज्ञ की गंगा


गरियाबंद जिला के छुरा ब्लॉक हरदी गांव में चल रही है संगीतमय श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के तीसरे दिन कथावाचक ने ध्रुव चरित्र और सती चरित्र का प्रसंग सुनाया प्रवचन कर्ता हुमेन्द्रगिरी गोस्वामी रांकाडीह वाले मधुबन धाम ने कहा कि भगवान शिव की अनुमति लिए बिना उमा अपने पिता दक्ष के यहां आयोजित यज्ञ में पहुंच गई यज्ञ में भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिए जाने से कुपित होकर सती ने यज्ञ कुंड में आहुति देकर शरीर त्याग दिया इससे नाराज शिव के गणों ने राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर दिया इसलिए जहां सम्मान ना मिले वहां कदापि नहीं जाना चाहिए ध्रुव कथा प्रसंग में भक्त ध्रुव की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि सौतेली मां ने अपने पिता की गोद में बैठा हुआ था अगर अपने पिता की गोद में बैठने से मना किया हुआ था।अगर अपने पिता की गोद मे बैठना है तो भगवान का भजन करो और वरदान मांगो कि अगला जन्म मेरे गर्भ से हो ध्रुव जी को बात लग गई और अपनी मां से कहा कि हम वन में जाकर भगवान का भजन करेंगे मन में दृढ़ करके वन में गए और 5 वर्ष की आयु में भगवान की प्राप्ति की देव जड़ भरत की कथा सुनाते हुए कहा कि वहां अपने पुत्रों को गोविंद का भजन करने का उपदेश देकर तपस्या को वन में चले गए भरत को हिरनी के बच्चे से अत्यंत मोह हो गया नतीजे में उन्हें मृग योनि में जन्म लेना पड़ा भरत प्राचीन भारत के एक प्रतापी राजा थे भगवान ऋषभदेव के जेष्ठ पुत्र थे श्रीमद्भागवत के पंचम स्कंदन में उनके  जीवन एवं अन्य जन्मों का वर्णन आता है ऋषभदेव के सौ पुत्रों में भरत ज्येष्ट एवं सबसे गुणवान थे ऋषभदेव ने संन्यास लेने पर उन्हें राजपाट सौंप दिया। भरत के नाम से ही लोग अजनाभखंड को भारतवर्ष कहने लगे। श्रीमद्भागवत के पंचम स्कंदन के सप्तम अध्याय में भरत चरित्र का वर्णन है कई करोड़ वर्ष धर्मपूर्वक शासन करने के बाद उन्हें राजपाट पुत्रों को सौंपकर वन आश्रम ग्रहण किया तथा भगवान की भक्ति में जीवन बिताने लगे एक बार नदी में बहते मृग को बचाकर वे उसका उपचार करने लगे धीरे-धीरे उस मृग से उनका मोह हो गया मृग के मोह में पड़ने के कारण अगले जन्म में उन्होंने एक मृगयोनि में जन्म लिया मृग योनि में जन्म लेने पर भी उन्हें पुराने उन नियमों के कारण अपने पूर्व जन्म का भान था मृग योनि में जन्म लेने के बाद भी भगवान का ध्यान करते थे अगले जन्म में उन्होंने एक ब्राह्मण कुल में पैदा हुए पुराने जन्म की याद पुराने जन्म की याद होने से इस बार वे संसार से पूरी तरह विरक्त रहे उनकी विरक्ति के कारण लोग उन्हें पागल समझने लगे तथा उनका नाम जड़ भरत पड़ गया जड़ भरत के रूप में वे जीवन पर्यंत भगवान की आराधना करते हुए अंतः में मोक्ष प्राप्त हुए।आस पास से कथा सुनने आ रहे हैं और इस संगीतमय कथा को सुन कर सब अपनी इस जीवन को ज्ञान गंगा कथा में डुबकी लगा रहे है इस श्री मद भागवत पुराण सफल बनाने में समस्त श्रद्धालु एवं दानदाता लगे हुए हैं।