1 जनवरी हमारा नववर्ष नही यह अंग्रेजी नववर्ष है ..राम बालक दास

1 जनवरी हमारा नववर्ष नही यह अंग्रेजी नववर्ष है ..राम बालक दास


1 जनवरी हमारा नववर्ष नही यह अंग्रेजी नववर्ष है ..राम बालक दास

ब्यूरो-प्रतिदिन की भांति ऑनलाइन सत्संग का आयोजन पाटेश्वर धाम के संत श्री राम बालक दास जी द्वारा सीता रसोई संचालन ग्रुप में किया गया जिसमें सभी भक्तजन जुड़कर  अपनी जिज्ञासाओ  का समाधान प्राप्त कीये

         पुरषोत्तम अग्रवाल जी ने दान दक्षिणा पर प्रकाश डालने की विनती बाबाजी  से की,  इस विषय पर प्रकाश डालते हुए बाबा जी ने बताया कि कलयुग में कहा गया है कि धर्म के चार पद में एक ही पद है दान, कलयुग में ज्यादा बड़ा यज्ञ नहीं कर सकते,  तन को सुखाने वाला व्रत नहीं कर सकते क्योंकि,  अन्न में प्राण हैँ,  कलयुग में ऐसे बहुत से साधन  है जो कि हम नहीं कर सकते, ध्यान धारणा समाधि भी,उचित अवस्था मे ही सम्भव हैँ, कलयुग के दूषित  वातावरण मे नही|, तो ऐसी स्थिति  मे क्या करें,  संसार मे व्याप्त,  संसार के जीव जगत में व्याप्त  परमपिता परमात्मा को देखते हुए दान करें,जितना हो सके दान करें,  चित्त की बुराइयों का दान करें अपने स्वयं के अहंकार का दान करें अन्न  का दान करें भूखों को भोजन प्रदान करें अर्थ उपार्जन का दसवाँ हिस्सा दान करें धर्म समाज परिवार के कल्याण में लगा सके ऐसा कर  अपने धन का  सदुपयोग करें,

            दान के बाद आता है दक्षिणा कई लोग समझते हैं कि यजमान का मन हो ना हो दक्षिणा मांग लो किसी का मन दुखा कर दक्षिणा लेना सर्वथा अनुचित है दक्षिणा का अर्थ होता है धन्यवाद, कार्य का आभार मानना, दक्षिणा अर्थात किसी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना दक्षिणा का अर्थ पहले होता था कि जब ब्राम्हण आपके घर आकर पूजा अर्चना करते थे तो यथाशक्ति यजमान उन्हें दक्षिणा प्रदान करता था यह उनका आभार व्यक्त करने हेतु किया गया एक सम्मान पूर्ण राशि होती थी, राजा यदि होता था तो वह मणि माणिक्य का  दान करता था किसान हो तो अन्न का दान करता था व्यापारी है तो वह द्रव्य और पैसे देकर के दक्षिणा देता था कुछ किसान तो चावल सब्जी देकर भी आभार व्यक्त करते थे और महाराज भी संतुष्ट हो जाते थे इसी प्रकार अपने गुरूजी जब अपने शिष्य को शिक्षा प्रदान कर देता है तो  गुरु दक्षिणा भी दी जाती है जैसे शिष्य लकड़ी जंगल से उन्हें लाकर गुरु दक्षिणा में दे दिया करते थे अपने घर से अन्य वस्त्र गाय आदि का दान दिया करते भूमि भी दान की जाती थी परंतु इसमें कोई भी जबरदस्ती नहीं होती थी जैसे कि आज देखने को मिल रही है, इस प्रकार दक्षिणा भी कभी भी जोर जबरदस्ती से नहीं ली जानी चाहिए  यथाशक्ति तथा भक्ति के अनुसार ही कार्य किया जाना चाहिए

         सत्संग परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए रामफल जी ने रामचरितमानस के सुंदरकांड की चौपाई "सचिव वैद्य गुरु..... को स्पष्ट करने की विनती बाबाजी से की, चोपाई  के भाव को व्यक्त करते हैं बाबा जी ने बताया कि सचिव मंत्री वैद्य गुरु जो हमारे पथ प्रदर्शक होते हैं यदि यह असत्य  बोलते हैं किसी के दबाव में आकर बोलते हैं तो राज्य धर्म और शरीर तीनों का ही नाश  है राज्य का नाश मंत्री के कारण, धर्म का नाश गुरु के कारण और वैद्य अर्थात  डॉक्टर के कारण हमारे शरीर का नाश निश्चित होता है इसीलिए गुरु को निश्चल और निष्कपट हो कर बात करना चाहिए चाहे उस सामने वाले को अच्छा लगे या बुरा लगे साथ ही जो मंत्री होता है उसे हमेशा सत्य बोलना चाहिए प्रजा का हितेषी होना चाहिए उसी प्रकार डॉक्टर को भी कभी किसी भी दवाब वश  कोई भी बात को हम से नहीं छुपाना चाहिए अपने मन को निर्भीक होकर हर बात को हम से प्रकट करना चाहिए

इस  प्रकार आज का अति सार्थक ज्ञानपूर्ण सत्संग पूर्ण हुआ

जय गो माता जय गोपाल जय सियाराम