सरकार की मंशा "रोका छेका" अभियान चलाकर फसलों को नुकसान से बचाना लेकिन यहां धरातल पर कुछ और-जिम्मेदार कौन ?

सरकार की मंशा

सरकार की मंशा "रोका छेका" अभियान चलाकर फसलों को नुकसान से बचाना लेकिन यहां धरातल पर कुछ और-जिम्मेदार कौन ?


 गौठान की जगह सडकों पर नजर आ रहे मवेशी बन रहे दुर्घटना का कारण और खुद भी हो रहे शिकार, 


       

दीपक शर्मा/कोरबा/पाली:-फसलों को खुली चराई से बचाने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के आह्वान पर जिले भर में गौठान योजना के अंतर्गत व्यापक रोका- छेंका अभियान का शुरुआत हो चुका है जहां फसल कटाई तक पशुओं को चरने के लिए खुले में नही छोड़े जाना है किंतु इसके बाद भी प्रमुख सडकों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ने वाले मार्गों पर पशुओं का कब्जा रोका- छेंका अभियान की पोल खोलती नजर आ रही है। 

बता ढेकी छत्तीसगढ़ सरकार इस ओर कमर कस रोका छेका अभियान को सफल बनाने में लगी वही इधर बीते 01 जुलाई से जिले के पाली विकासखंड में जिला प्रशासन, प्रशासनिक अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में जोर- शोर के साथ रोका- छेंका अभियान प्रारंभ किया गया जो सफल नही दिख रहा और नगर से लेकर ग्रामीण इलाकों की सड़कों पर मवेशियों का जमावड़ा इस अभियान को मुह चिढ़ाने दिख रहा है। गौठान निर्माण एवं इसके अधीन रोका- छेंका अभियान शुरुआत के बाद भी दिन- रात सड़कों पर मवेशियों के दिखने से यातायात प्रभावित तो हो ही रहा है साथ ही प्रमुख बात यह है कि एक तरफ दोपहिया वाहन चालक रात्रि के समय सड़क पर बैठे मवेशियों के जद में आकर दुर्घटना का शिकार हो रहे है और उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है तो दूसरी ओर भारी वाहनों की चपेट में आने से खुद भी उन बेजुबान जानवरों की मौत हो रही है अथवा बुरी तरह घायल हो जा रहे है। 


गौठान की जगह सड़को पर बेतरतीब नजर आते मवेशियों को आपने भी जरुर देखा होगा जो पुरे सडक को घेर कर बैठे रहते हैं जहां दोपहिया वाहन चालकों के साथ वे पशु भी सुरक्षित नही है जो छत्तीसगढ़ सरकार के महत्वकांक्षी कहे जाने वाले गौठान योजना की सच्चाई बयां कर रही है।



 अब सवाल यह उठता है कि प्रदेश सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना जिसमे हस्तमुक्त पानी की तरह पैसा बहाया गया और खूब वाहवाही भी लुटी गई फिर परिणाम सफल  क्यों नही  हो रहा..? 



आज गोठानो की स्थिती को देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम जनता के पैसों का प्रशासनिक तौर पर कितना सही इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे में जब पशुओं को सडकों पर ही दिखना था तो गोठानों के निर्माण पर करोड़ो आखिर क्यों खर्च किया गया। वर्तमान में भी गोठानो पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है किंतु हाल के तो व्यवस्था लचर दिख रहा है तो आगे देखने वाली बात होगी कि गोठानो के पूर्ण विकसित होने से प्रदेश का कितना विकास होगा और तब पशुओं के लिए व्यवस्था कैसी रहेगी..?