*विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लेजर अनुप्रयोग में समावेशी विकास पर अंतर्राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी*

*विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लेजर अनुप्रयोग में समावेशी विकास पर अंतर्राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी*

*विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लेजर अनुप्रयोग में समावेशी विकास पर अंतर्राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी*

ब्यूरो-आईएसबीएम विश्वविद्यालय में शिक्षा के बेहतर विकास के लिए तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बुधवार 30 दिसंबर को स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग और विज्ञान क्लब के तत्वाधान में एक दिवसीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में लेजर अनुप्रयोग में समावेशी विकास पर अंतर्राष्ट्रीय ई- संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उक्त कार्यक्रम में देश-विदेश से अनेक विद्वान शामिल हुए। अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरुआत विश्वविद्यालय के वर्चुअल भ्रमण से हुई। ई- संगोष्ठी में सभी का स्वागत करते हुए तथा इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए डॉ. विनय अग्रवाल कुलाधिपति आईएसबीएम विश्वविद्यालय ने कहा कि कोविड-19 संक्रमण काल में विश्वविद्यालय के सभी शैक्षणिक गतिविधियों को ऑनलाइन मोड पर संचालित किया जा रहा है। इसी क्रम में यह अंतर्राष्ट्रीय स्तर का ई-संगोष्ठी विश्वविद्यालय द्वारा छात्र-छात्राओं की ज्ञान वृद्धि के लिए समय-समय पर आयोजित किया जा रहा है। कुलपति,डॉ आनंद महलवार ने इस संगोष्ठी में उपस्थित सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। डॉक्टर बी. पी. भोल, कुलसचिव ने विज्ञान के बढ़ते प्रभाव एवं प्रौद्योगिकी के विकास से आम जीवन में आए परिवर्तनों तथा लेजर तकनीक के विकास से होने वाले लाभों के प्रति अपना विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम डॉ. एन. के. स्वामी, अकादमिक डीन ने लेजर तकनीक को उन्नत और प्रभावशाली बताया। कार्यक्रम के विशेष अतिथि साउथ अफ्रीका के जोहानसबर्ग विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान के डॉ. पंकज मोहन्ती थे । उन्होंने ऑक्साइड नैनो सामग्री की संरचना एवं गुणों के बारे में बताया तथा कहा कि 21वीं सदी नैनो सदी बनने जा रही है। मोटे तौर पर नैनोकणों को कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थो में विभाजित किया जा सकता है। अकार्बनिक नैनोकण धातु (चांदी, एल्यूमीनियम, टिन, सोना, कोबाल्ट, तांबा, लोहा, मोलिब्डेनम, निकल, टाइटेनियम) एवं उनके धातु-ऑक्साइड का अत्यधिक प्रयोग हो रहा है। उदाहरण के तौर पर सिल्वर नैनोकण रेफ्रीजरेटर, कपड़ों, सौंदर्य प्रसाधनों, टूथब्रशों, वाटर फिल्टरों आदि में प्रयोग होते है। वही, जिंक ऑक्साइड नैनोकणों का उपयोग सौंदर्य प्रसाधन क्रीम में होता है। गोल्ड नैनोकणों की कोटिंग से ऊंची इमारतों या गाड़ियों के ग्लास आसानी से साफ किये जा सकते हैं। कॉपर के नैनोकण फफूंद तथा जीवाणुनाशक के रूप में चिकित्सा में प्रयोग हो रहे हैं। इनमें बैक्टीरिया तथा फफूंद को नष्ट करने की क्षमता होती है। नैनोकणों के उपयोग के साथ कुछ चुनौतियां भी उभर रही हैं। धात्विक नैनोकणों के उत्पादन और उपयोग में लगातार वृद्धि होने के कारण पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। साथ ही पैराबैगनी किरणों के प्रभाव, उपयोग और सावधानियों से अवगत कराया। कार्यक्रम के विशेष अतिथि एवं वक्ता अमेरिका के पेनसेल्वन्या विश्वविद्यालय के अनुसंधान वैज्ञानिक डॉ. मनीष गुप्ता थे। उन्होंने पोर्टेबल NMR चुम्बकीय प्रणाली का विकास, PDMS का विकास, कस्टम मेड नियंत्रक सर्किट आदि विषयों पर विचार व्यक्त किया तथा परमाणु चुंबकीय अनुनाद अर्थात NMR के विषय मे बताते हुए कहा कि जब एक मजबूत चुंबकीय क्षेत्र में हजारों गज़ या अधिक में रखा जाता है, तो नाभिक जो कि प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की संख्या भी नहीं है, मैग्नेट की तरह व्यवहार करते हैं, और परमाणु चुंबकीय क्षण मैं केवल एक निश्चित अनुमत दिशा में उन्मुख होता है। कार्यक्रम के प्रति सभी प्राध्यापक एवं छात्र-छात्राएं उत्साहित दिखाई दिए तथा कुछ प्राध्यापकों एवं छात्रों ने मुख्य वक्ता से प्रश्न पूछकर अपनी जिज्ञासा शांत किया। अंत में विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग के विभागाध्यक्ष और कार्यक्रम के संयोजक प्रो. प्रवीण यादव ने आभार व्यक्त करते हुए आगे भी इस प्रकार के आयोजन करने हेतु छात्र-छात्राओं को आश्वस्त किया। उक्त संगोष्ठी को सफल बनाने में विश्वविद्यालय के प्रो. चंद्रशेखर कुर्रे, प्रो. दीपेश निषाद, प्रो.गोकुल साहू, प्रो. गरिमा दीवान, प्रो.डायमंड साहू, प्रो. नीति पाण्डे का विशेष सहयोग रहा।